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Showing posts from February 25, 2015

बचपना

कभी गिरना, कभी उठना,
कभी रोना, कभी हँसना ।
कभी सोना, कभी जगना,
कभी हाथो के बल चलना ॥

माँ की एक झलक के लिए,
कभी रोना, सुबकना ।
शायद यही है,
मेरा बचपना ॥

पापा के शब्दों को,
बहुत ध्यान से सुनना ।
बहुत याद आये ये,
सुनहरा पचपना ॥

किसी और से सहमना,
और डरना ।
फिर माँ के आँचल,
के पीछे जा छिपना ॥

कभी दादाजी की मुछो,
से खेलना और खीचना ।
बहुत ही प्यारा था,
मेरा बचपना ॥

पापा से जिद करना,
और रटना  खिलौना-खिलौना ।
काश फिर आ जाये,
वो बिता बचपना ॥

दादी से परियों की,
कहानी को सुनना ।
फिर कभी ना आया,
वो बिता बचपना ॥

दोस्तो संग हँसी और ठिठोली,
उनके साथ मस्ती और घूमना - फिरना ।
आज फिर याद आया,
बचपना-बचपना ॥