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Showing posts from June 4, 2015

हरीयाली

जब आता है सावन और चलती है पुरवाई,
ऐसे मेघ बरसते जैसे हरीयाली आयी !
शान्त पेङ पर बैठी कोयल करती है गान ,
नाचता हुआ मोर करता अपनी सुन्दरता पर अभीमान !!

संध्या जब है आती तो प्रकती लगती सुहावनी,
तो फुलो का रंग लगती मन भावनी !
गर्मी मे पेङ से पत्ते ऐसे टुटे,
जैसे शरीर से आत्मा छुटे !!

गर्मी मे सुखा हसता हुआ जाता,
जो बरसात मे रोता हुआ दीन बिताता !
सुबह सुरज जब सीना ताने आता,
तो अंधकार भय से सुदुर भाग जाता !!

सुबह की पहली किरण के साथ जब वह आता,
पक्षी करते गान जब वह मुस्कराता !
और जब जब दोपहर को गर्मी है होती,
तो सारी दुनिया निर्जन बनके घर के अन्दर सोती !!

और जब गोधुली मे सुर्य की होती बिदायी,
तो ऐसा लगता मानो अन्धकार ने ली अंगङायी !
शाम को अंधकार खुंशिया खुब मनाये,
और आसमा दुःखी होकर आंसु खुब बहाये !!

शाम को दुनिया होती निर्जन और विरानी,
इसी समय फुलो से भरती रात की रानी !
शाम को चंद्रमा बढता हुआ आता,
और तारा खुशियों का गीत सुनाता !!

और सुबह सुर्य का सारथी अरुण आता,
और अंधकार घर के किसी कोने मे चुप जाता !
शाम को जो आसमा दुःख से नहाये,
अब वही आसमा खुशियों से नहाये !!