Friday, July 10, 2015

पहली खुशी

जब माँ के नर्म
हांथो का हुआ था स्पर्श,
रोम-रोम खिल उठा मेरा,
बहूत खुश हुआ था मैं|

जब भी किसी की डाट मिली,
हमेशा मेरे सामने दीवार सी अडिग,
हमेशा दुलारा, पुचकारा मुझे,
बहूत खुश हुआ था मैं||

जब पापा का हाँथ सर पर पड़ा,
लगा जैसे मुझे हिम्मत मिल गयी,
जब उंगली पकड़कर हिम्मत से चलना सीखा,
बहूत खुश हुआ था मैं|

जब दादा दादी मेरी लगती छुपाते,
और मेरी गलतियाँ यूँ माफ कर देते,
और ऐसी मुस्कान जैसे मैने कुछ किया ही ना हो,
बहूत खुश हुआ था मैं||

पहला खिलौना जो इक सायकिल,
जो सबसे अनमोल और अनोखी थी,
वही थी मेरी पहली खुशी,
बहूत खुश हुआ था मैं|
बहूत खुश हुआ था मैं...........
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