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शकुन्तला

दुर्वाशा के वचनो का ना था उन्हे ज्ञान !
वह सुन रही थी पक्षियो का सुरीला गान !!

दुर्वाशा ने क्रोधित होकर कहा !
दुश्यन्त तुम्हे भुल जायेगा शकुन्तला !!

शकुन्तला इस बात से थी अज्ञात !
की उसकी जिन्दगी मे हो गयी रात !!

अनुसुइया और अनुप्रिया ने कराया उसे ज्ञात !
यह सुनते ही उसकी जिन्दगी मे हो गयी रात !!

वह दौङी और दुर्वाशा को कीया चरणस्पर्श !
वह अपनी जिन्दगी से कर रही थी संघर्ष !!

फिर शकुन्तला ने की छमा याचना !
दुर्वाशा ने भी की उसके लिये मंगल कामना !!

मेरे कण्ठो से जो तुम्हारी जिन्दगी मे आयी बाढ !
उसे दुर करेगी मीन और मुद्रीका की धार !!

जब शकुन्तला के वियोग मे पेङ पौधे सुख जाये !
तथा मृग और हीरन आसु खुब बहाये !!

पेङो को ऐसा लगता मानो अभी गिर जायेंगे !
जीवो को ऐसा लगता मानो अभी मिट जायेंगे !!

माता-पिता रोकर आंसु खुब बहाये !
पशु-पक्षी भी दुर्वाशा को कोसते जाये !!

विश्वामित्र और मेनका का रोकर बुरा हाल !
नदी और बादलो के लिये बन गया काल !!

शकुन्तला कही और मन कही और !
ऐसा लगता जैसे रस्सी के दो छोर !!

दुर्वाशा अपने इस शाप पर पछताये !
तथा अपने मन को झुठी दिलासा दिलाये !!

कष्ट के इस दिन मे भगवान ने ना किया रहम !
लोगो के लिये …