दुःख

दुःख की नही कोई  परीभाषा,
वह है पत्तो की तरह !
आता है बसन्त की तरह,
जाता है पतझण की तरह !!


होता ये धुप छाव की तरह,
अपनो के प्यार की तरह !
कभी घटता कभी बढता,
राजाओ के राज की तरह !!


वे कैसे सहते होंगे जो है,
निःशब्द निष्प्राण की तरह !
वे कैसे सहते होंगे जो,
सहते है अंजान की तरह !!


दुनिया मे दुःख से बचा नही कोई,
यहां करे कोई भरे कोई-कोई!
यहां कोई दुःखी है,
और दुनिया है सोई !!


दुःख की नही कोई भाषा,
यह है एक अमुक भाषा !
बिना बोले सब समझे,
इसकी यह परिभाषा !!
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