हम कैसे जिये

हम इस दुनिया में कैसे जिये,
जहा हर  है तरफ है झूठ और मक्कारी !

जहा हमें बेबस , लाचार और मुर्ख,
समझती है ये दुनिया सारी !!

हम इस दुनिया में कैसे जिए ,
अपनी खुशियों का पजामा कैसे सिये !

हो गयी है जिन्दगी मेरी जहर ,
इस कड़वे से सच को कैसे पीये !!

रोज-रोज मरता रहु इसलिए की ,
कल सवेरा मेरी अंतिम शाम न बने !

हर समय लगता है डर इस बात का ,
कही हमारा भी उन जैसा अंजाम न बने !!
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