वक्त



कहते हैं वक्त किसी का नहीं होता,
हर वक्त बदलता रहता है|
वक्त का मारा,
इस दुनियां के सितम सहता है||


कल के बच्चे जो,
खुद के पैरो पर खड़ा भी भी नहीं हो पाता था|
अब कभी भी सीना ताने,
सामने पाता हूँ||


कल जिसके पहले शब्द को, 
सुनने को लालायित रहता था मै|
आज वो मुझे,
सुनना चाहता ही नहीं||


ये वक्त का ही तो तकाजा है,
कि कल अपने सपनो को बेचकर|
जिसके लिये खुबसुरत पल बुना,
वही चौराहे पर मेरी बोली लगा गया||


मेरे वक्त ने तो इस कदर मारा, 
कि मै अकेला हो गया|
डरता तो मै उसके लिये हूँ,
कही वह भी वक्त का शिकार ना हो जाये||


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